Happy Engineer’s Day

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परिचय

प्रत्येक वर्ष 15 सितंबर को मनाया जाने वाला इंजीनियर्स डे केवल एक महान व्यक्ति, सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है, बल्कि यह भारत की प्रगति की नींव रखने वाले उन अनगिनत गुमनाम इंजीनियरों के योगदान को स्वीकार करने का दिन भी है। यह दिन हमें राष्ट्र-निर्माण में इंजीनियरों की भूमिका का मूल्यांकन करने, उनकी वर्तमान चुनौतियों को समझने और ‘विकसित भारत @ 2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भविष्य का रोडमैप तैयार करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा लिए प्रासंगिकता:

  • GS Paper 1: आधुनिक भारतीय इतिहास (महत्वपूर्ण व्यक्तित्व – सर एम विश्वेश्वरैया)।
  • GS Paper 2: शासन, सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप (NEP 2020, स्किल इंडिया, इंजीनियरिंग सेवाओं में सुधार की बहस)।
  • GS Paper 3: आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी (मेक इन इंडिया, इसरो, आईटी क्रांति, नवीकरणीय ऊर्जा)।
  • निबंध: ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी: एक दोधारी तलवार’ या ‘भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश: अवसर या चुनौती?’ जैसे विषयों के लिए यह महत्वपूर्ण सामग्री प्रदान करता है।

दूरदर्शी इंजीनियर-नीति निर्माता – सर एम. विश्वेश्वरैया की विरासत

सर एम. विश्वेश्वरैया (एम.वी.) का जीवन और कार्य आज के इंजीनियरों और प्रशासकों के लिए सत्यनिष्ठा, दूरदर्शिता और राष्ट्र-सेवा का एक आदर्श है। पूना के साइंस कॉलेज से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने के बाद, वे ब्रिटिश भारत के सबसे अग्रणी इंजीनियरों में से एक बने।

एक इंजीनियर के रूप में युगांतरकारी उपलब्धियाँ

सर एम.वी. ने जल प्रबंधन और सिविल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य किए। उन्होंने दक्कन के पठार में एक जटिल सिंचाई प्रणाली को सफलतापूर्वक लागू किया। पुणे के पास खडकवासला जलाशय के लिए 1903 में उनके द्वारा डिजाइन और पेटेंट किए गए स्वचालित वियर वॉटर फ्लडगेट्स एक अभूतपूर्व नवाचार थे, जिसने बांधों को नुकसान पहुँचाए बिना बाढ़ के पानी को नियंत्रित करना संभव बनाया। 1908 की मूसी नदी की विनाशकारी बाढ़ के बाद, उन्होंने हैदराबाद शहर के लिए एक आधुनिक बाढ़ सुरक्षा प्रणाली का डिजाइन तैयार किया, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। मैसूर के मुख्य अभियंता के रूप में, उन्होंने कावेरी नदी पर कृष्णराज सागर (KRS) बांध के निर्माण की कल्पना की और उसका पर्यवेक्षण किया। यह उस समय एशिया का सबसे बड़ा जलाशय था, जिसने मांड्या क्षेत्र की बंजर भूमि को उपजाऊ कृषि भूमि में बदल दिया।

एक प्रशासक के रूप में, उन्होंने मैसूर को एक ‘मॉडल स्टेट’ में बदल दिया। उनका प्रसिद्ध नारा था “औद्योगिकीकरण करो या नष्ट हो जाओ” । उन्होंने मैसूर सोप फैक्ट्री, मैसूर आयरन एंड स्टील वर्क्स (भद्रावती), और स्टेट बैंक ऑफ मैसूर जैसे कई प्रमुख उद्योगों की स्थापना की। उन्होंने तकनीकी शिक्षा के महत्व को समझते हुए 1917 में गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज (अब UVCE) और 1916 में मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी विरासत इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक इंजीनियर केवल परियोजनाओं का निष्पादनकर्ता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी योजनाकार और समाज-सुधारक भी हो सकता है। उन्हें 1955 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

सर एम. विश्वेश्वरैया की प्रमुख इंजीनियरिंग परियोजनाएं और उनका महत्व

परियोजना 

स्थान 

अनुमानित वर्ष 

तकनीकी नवाचार 

महत्व/प्रभाव 

स्वचालित फ्लडगेट

खडकवासला, पुणे

1903

पेटेंटेड प्रणाली जो बाढ़ के पानी को नियंत्रित करती है

भारत में आधुनिक बांध सुरक्षा और जल प्रबंधन में क्रांति 3

हैदराबाद बाढ़ सुरक्षा प्रणाली

हैदराबाद

1909

मूसी नदी के लिए जलाशय आधारित बाढ़ प्रबंधन

शहर को विनाशकारी बाढ़ से बचाया, शहरी नियोजन का उत्कृष्ट उदाहरण 7

कृष्णराज सागर (KRS) बांध

मांड्या, मैसूर

1931

एशिया का सबसे बड़ा जलाशय (उस समय), ब्लॉक सिंचाई प्रणाली

मैसूर में कृषि क्रांति, औद्योगिकीकरण और पेयजल आपूर्ति का आधार 9

भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स

भद्रावती, मैसूर

1923

औद्योगिकीकरण को बढ़ावा

मैसूर राज्य का औद्योगिक विकास, आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम 11

आधुनिक भारत के वास्तुकार – राष्ट्र-निर्माण में इंजीनियरों की भूमिका

स्वतंत्रता के बाद से भारत की विकास गाथा में इंजीनियरों ने एक अदृश्य लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नेहरू के ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ जैसे भाखड़ा-नांगल बांधों और सार्वजनिक उपक्रमों के निर्माण से लेकर हरित क्रांति के लिए आवश्यक सिंचाई नेटवर्क और कृषि यंत्रीकरण तक, भारतीय इंजीनियरों ने तकनीकी रीढ़ की हड्डी के रूप में काम किया।

यह यात्रा सितारों तक भी पहुंची, जहां इसरो की सफलता ‘मितव्ययी इंजीनियरिंग’ (frugal innovation) का वैश्विक प्रतीक बनी। साइकिल पर रॉकेट के पुर्जे ले जाने से लेकर पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुंचने (मंगलयान) और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतरने (चंद्रयान-3) तक का सफर भारतीय इंजीनियरिंग कौशल का प्रमाण है। 1990 के दशक के बाद, भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने वैश्विक आईटी सेवा उद्योग में भारत को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया और UPI जैसे डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का निर्माण किया।

इंजीनियरिंग- समकालीन चुनौतियाँ और बहस

सर एम.वी. के उत्कृष्टता के मॉडल के विपरीत, आज भारतीय इंजीनियरिंग क्षेत्र गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।

मात्रा-गुणवत्ता का विरोधाभास और रोजगार-योग्यता का संकट

भारत में इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, लेकिन यह वृद्धि गुणवत्ता की कीमत पर हुई है। AICTE जैसे नियामक निकायों पर मात्रा को गुणवत्ता पर प्राथमिकता देने का आरोप है। पाठ्यक्रम पुराना है और उद्योग की जरूरतों से मेल नहीं खाता, जो व्यावहारिक अनुप्रयोग के बजाय रटने पर जोर देता है।

परिणामस्वरूप, 80-83% इंजीनियरिंग स्नातक बेरोजगार हैं या नौकरी के लिए अयोग्य हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 95% इंजीनियर प्रोग्रामिंग नौकरियों के लिए अनुपयुक्त हैं। यह डिग्री और कौशल के बीच एक खतरनाक अंतर को उजागर करता है।

भारतीय इंजीनियरिंग परिदृश्य – प्रमुख आँकड़े और चुनौतियाँ

क्षेत्र

प्रमुख आँकड़ा/तथ्य

निहितार्थ

रोजगार-योग्यता

83% इंजीनियरिंग स्नातक नौकरी या इंटर्नशिप प्रस्ताव के बिना हैं।

डिग्री और उद्योग-प्रासंगिक कौशल के बीच भारी अंतर।

तकनीकी कौशल

केवल 3.84% इंजीनियर स्टार्टअप में सॉफ्टवेयर नौकरियों के लिए आवश्यक कौशल रखते हैं।

नवाचार और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ी बाधा।

कोर इंजीनियरिंग

केवल 7% स्नातक कोर इंजीनियरिंग नौकरियों के लिए उपयुक्त हैं।

‘मेक इन इंडिया’ और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए खतरा।

उद्योग-अकादमिक अंतर

95% इंजीनियर प्रोग्रामिंग नौकरियों के लिए अनुपयुक्त माने जाते हैं।

पाठ्यक्रम पूरी तरह से उद्योग की जरूरतों से बाहर है।

टेक्नोक्रेट बनाम नौकरशाह: एक अखिल भारतीय इंजीनियरिंग सेवा की आवश्यकता

विशेषज्ञों ने लंबे समय से एक ‘इंजीनियरिंग आयोग’ और एक अखिल भारतीय इंजीनियरिंग सेवा (AIES) की स्थापना की मांग की है । तर्क यह है कि प्रशासनिक संरचना सामान्यज्ञों को विशेषज्ञों पर प्राथमिकता देती है, जिससे इंजीनियर नीति-निर्माण में हाशिए पर चले जाते हैं। AIES की स्थापना से तकनीकी विशेषज्ञता को शासन के शीर्ष स्तर पर एकीकृत किया जा सकेगा, जैसा कि सर एम.वी. के कार्यकाल में देखा गया था।

एक इंजीनियरिंग पुनर्जागरण के लिए नीतिगत हस्तक्षेप

सरकार ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए कई पहलें शुरू की हैं:

  • ‘मेक इन इंडिया’ (2014): इसका उद्देश्य भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाना है, जिससे इंजीनियरों के लिए अवसर पैदा हों। हालांकि, कुशल कार्यबल की कमी एक बड़ी बाधा है।
  • ‘स्किल इंडिया मिशन’ (2015): इसका उद्देश्य उद्योग-प्रासंगिक कौशल प्रदान करके युवाओं की रोजगार-योग्यता को बढ़ाना है। यह एक आवश्यक उपाय है, लेकिन यह शिक्षा प्रणाली की मूलभूत खामियों को दूर नहीं करता है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020: यह शिक्षा प्रणाली में समग्र सुधार का एक दूरदर्शी दस्तावेज है, जो बहु-विषयक दृष्टिकोण, व्यावहारिक शिक्षा और उद्योग-अकादमिक सहयोग पर जोर देता है।

इन नीतियों में एक स्पष्ट संबंध है: ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता ‘स्किल इंडिया’ द्वारा प्रदान किए गए कुशल कार्यबल पर निर्भर करती है, और एक स्थायी समाधान के लिए NEP 2020 का प्रभावी कार्यान्वयन आवश्यक है।

भविष्य की इंजीनियरिंग – विकसित भारत 2047 की ओर भारत का मार्ग

‘विकसित भारत @ 2047’ का लक्ष्य प्राप्त करना इंजीनियरों के बिना असंभव है। भविष्य के भारतीय इंजीनियर को दो प्रमुख शक्तियों – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और नवीकरणीय ऊर्जा – के चौराहे पर खड़ा होना होगा।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की अनिवार्यता: AI इंजीनियरिंग भूमिकाओं को मौलिक रूप से बदल रहा है। यह पारंपरिक आईटी नौकरियों के लिए एक खतरा है, लेकिन AI विकास, डेटा विज्ञान और मशीन लर्निंग में नए अवसर भी पैदा करता है। भारत को केवल AI का उपभोक्ता बनने के बजाय AI उत्पादों का निर्माता बनने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • एक हरित भविष्य को शक्ति देना: भारत ने 2030 तक 500 GW नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। सिविल, इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियर सौर पार्कों, पवन टरबाइनों और जलविद्युत परियोजनाओं की योजना, डिजाइन और निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

निष्कर्ष

सर एम. विश्वेश्वरैया के उत्कृष्टता के आदर्श से लेकर वर्तमान में रोजगार-योग्यता के संकट तक, भारतीय इंजीनियरिंग ने एक लंबा सफर तय किया है। ‘अमृत काल’ में भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने इंजीनियरों को कैसे शिक्षित, सशक्त और महत्व देता है। इसके लिए NEP 2020 के माध्यम से शिक्षा में सुधार, स्किल इंडिया के माध्यम से लक्षित अपस्किलिंग, और मेक इन इंडिया के माध्यम से अवसर पैदा करने जैसे समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है। हमें अपने इंजीनियरों को नौकरी चाहने वालों से नौकरी बनाने वालों और निष्पादकों से नीति-निर्माताओं में बदलना होगा। यही सर एम. विश्वेश्वरैया को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


UPSC CSE अभ्यास प्रश्न

प्रारंभिक परीक्षा के लिए (MCQs)

प्रश्न: हाल की रिपोर्टों के अनुसार भारत में इंजीनियरिंग स्नातकों की कम रोजगार-योग्यता के लिए निम्नलिखित में से कौन से कारक मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं?

  1. उद्योग की जरूरतों और अकादमिक पाठ्यक्रम के बीच बढ़ता अंतर।
  2. व्यावहारिक कौशल और सॉफ्ट स्किल्स पर अपर्याप्त ध्यान।
  3. तकनीकी शिक्षण संस्थानों की संख्या में कमी।
  4. उच्च शिक्षा में अनुसंधान और विकास के लिए अपर्याप्त धन।

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 1, 2 और 4

(c) केवल 3 और 4

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (b)

मुख्य परीक्षा

प्रश्न: भारत में इंजीनियरिंग स्नातकों की उच्च संख्या के बावजूद, उनकी रोजगार-योग्यता एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। इस ‘मात्रा बनाम गुणवत्ता’ विरोधाभास के कारणों का विश्लेषण करें और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस चुनौती को किस हद तक संबोधित कर सकती है? (250 शब्द, 15 अंक)

उत्तर की रूपरेखा:

  • भारत में इंजीनियरिंग स्नातकों की स्थिति को बताते हुए परिचय लिखिए। 
  • इनकी रोजगार योग्यता का विश्लेषण कीजिए। 
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बिंदुओं से समझाइए कि कैसे यह इस चुनौती का समाधान कर सकती है। 
  • अंत में सुझावों के साथ उत्तर समाप्त कीजिए।

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