प्रो. Harsh V. Pant के साथ संवाद पर आधारित
आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति अनिश्चितता, अस्थिरता और तेज़ बदलावों के दौर से गुजर रही है। पुरानी व्यवस्थाएँ कमजोर हो रही हैं, संस्थाएँ प्रभाव खो रही हैं और शक्ति संतुलन लगातार बदल रहा है। इतालवी चिंतक एंटोनियो ग्राम्शी के शब्दों में—
“पुराना मर रहा है और नया अभी जन्म नहीं ले पाया है।”
इसी संक्रमणकाल में भारत खड़ा है—पहले से अधिक शक्तिशाली, अधिक आत्मविश्वासी, लेकिन साथ ही अधिक कठिन निर्णयों के सामने।
शक्ति के साथ उद्देश्य क्यों आवश्यक है?
प्रो. हर्ष वी. पंत के अनुसार, शक्ति और उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक-दूसरे के पूरक होते हैं।
जैसे-जैसे किसी देश की क्षमताएँ बढ़ती हैं, वैसे-वैसे उससे अपेक्षाएँ भी बढ़ती हैं—
- देश के भीतर जनता अपेक्षा करती है कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा हो
- और अंतरराष्ट्रीय समुदाय अपेक्षा करता है कि वह जिम्मेदार भूमिका निभाए
यदि शक्ति के पीछे कोई स्पष्ट उद्देश्य न हो, तो नीति दिशाहीन (drift) हो जाती है।
भारत की विदेश नीति की 75 वर्षों की यात्रा इसी खोज की कहानी है—कि बढ़ती क्षमताओं का उपयोग किस दिशा में किया जाए।
G20 की मेजबानी (2023) से लेकर आज तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ता भारत—अब यह प्रश्न टालना संभव नहीं है:
भारत अपनी शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिए करेगा?
नेहरू से मोदी तक: निरंतरता और परिवर्तन
भारत की विदेश नीति को “अचानक बदलावों” की बजाय ऐतिहासिक चरणों (phases) के रूप में समझना अधिक उचित है।
नेहरू काल (1947–1964): राष्ट्र का एकीकरण
Jawaharlal Nehru के समय प्राथमिक चुनौती थी—
- नवस्वतंत्र भारत का एकीकरण
- शीतयुद्ध के दबावों में संतुलन
गुटनिरपेक्षता, एशियाई एकजुटता और नैतिक नेतृत्व—ये सभी प्रयास इस प्रश्न से जुड़े थे:
भारत विश्व में किस प्रकार की भूमिका निभाए?
मोदी काल (1990 के बाद की क्षमताओं का समेकन)
Narendra Modi के दौर में भारत उन आर्थिक और रणनीतिक क्षमताओं को समेकित कर रहा है जो 1991 के बाद विकसित हुईं।
- 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य
- अमेरिका और अन्य शक्तियों के साथ खुली साझेदारी
- ऐतिहासिक झिझक में कमी
दोनों नेताओं में एक समानता स्पष्ट है—
? भारत को बहाव (drift) में छोड़ने की अनुमति नहीं।
चीन: रोमांटिक सोच से यथार्थवाद तक
भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ा परिवर्तन 2020 के गलवान संघर्ष के बाद आया।
प्रो. पंत के शब्दों में—
भारत-चीन संबंधों में रोमांटिक दृष्टिकोण अब हमेशा के लिए समाप्त हो चुका है।
आज की नीति तीन स्पष्ट तथ्यों पर आधारित है:
- चीन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
- चीन की बातों पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं किया जा सकता
- चीन के इरादों को उसके कर्मों से समझना होगा
चीन स्वयं को अमेरिका को चुनौती देने वाली महाशक्ति मानता है। इस प्रक्रिया में भारत उसके लिए सहयोगी नहीं, बल्कि रणनीतिक बाधा है।
भारत को दक्षिण एशिया तक सीमित रखने की चीनी रणनीति—UNSC, पाकिस्तान, सैन्य सहयोग—सब इसी दिशा में हैं।
भारत की प्रतिक्रिया स्पष्ट है:
संवाद भी, प्रतिरोध भी, और साथ-साथ आंतरिक क्षमता निर्माण।
पाकिस्तान: क्षमता नहीं, समर्थन से चुनौती
भारत की पाकिस्तान से चुनौती उसकी आंतरिक शक्ति के कारण नहीं, बल्कि उसके बाहरी समर्थकों के कारण है- पहले अमेरिका, अब चीन
पाकिस्तान-चीन सैन्य तालमेल अब खुलकर सामने है।
भारत-अमेरिका संबंध 1990 के बाद गहरे हुए हैं, लेकिन अमेरिका की लेन-देन आधारित राजनीति (विशेषकर ट्रंप के दौर में) भारत के लिए जटिलता पैदा करती है।
भारत जैसे लोकतंत्र में विदेश नीति तभी सफल हो सकती है जब जनसमर्थन बना रहे।
पड़ोसी नीति: कोई स्वर्ण युग नहीं
भारत की पड़ोसी नीति का कोई “स्वर्ण युग” कभी नहीं रहा।
कारण स्पष्ट है:
- भारत संरचनात्मक रूप से बहुत बड़ा है
- छोटे पड़ोसी अपनी पहचान और संतुलन के लिए बाहरी शक्तियों की ओर देखते हैं
प्रो. पंत इसे कहते हैं—
“नार्सिसिज़्म ऑफ़ माइनर डिफरेंसेज़”
(छोटे मतभेदों का असामान्य रूप से बड़ा हो जाना)
आज चीन का आर्थिक और बुनियादी ढांचा प्रभाव दक्षिण एशिया में वास्तविकता है।
भारत इसका जवाब केवल एक तरीके से दे सकता है:
विश्वसनीय, समयबद्ध और संवेदनशील विकास साझेदारी।
श्रीलंका और मालदीव में हालिया अनुभव बताते हैं—
संकट के समय उपस्थित रहना दीर्घकालिक भरोसा बनाता है।
बदलती विश्व व्यवस्था और भारत
शीतयुद्ध के बाद बनी विश्व व्यवस्था अब काम नहीं कर रही:
- व्यापार = स्थिरता (यह धारणा टूटी)
- बहुपक्षीय संस्थाएँ जड़ हो चुकी हैं
- “फ्रेंड-शोरिंग” का दौर
आज यह स्पष्ट नहीं है कि नई व्यवस्था कैसी होगी—
द्विध्रुवीय? बहुध्रुवीय? या कुछ और?
भारत का लक्ष्य प्रभुत्व नहीं, बल्कि प्रभाव (influence) है:
- ग्लोबल साउथ की आवाज़
- अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन
- इंडो-पैसिफिक दृष्टि
- आपदा राहत और मानवीय सहयोग
यह संक्रमणकाल भारत के लिए अवसर भी है—यदि शक्ति के पीछे स्पष्ट उद्देश्य हो।
मजबूत नेता, कमजोर संस्थाएँ
आज ट्रंप, पुतिन, शी जिनपिंग और मोदी जैसे नेता केंद्र में हैं।
यह केवल व्यक्तित्व राजनीति नहीं, बल्कि संस्थागत क्षरण का संकेत है।
जब संस्थाएँ कमजोर होती हैं, तो लोग व्यक्तियों में समाधान खोजते हैं।
लेकिन इतिहास यह सिखाता है— नेता आते-जाते हैं, संस्थाएँ टिकती हैं या टूटती हैं।
निष्कर्ष: भारत होने की जिम्मेदारी
आज भारत के पास शक्ति है, लेकिन उद्देश्य को लगातार स्पष्ट करना होगा। एक ऐसी दुनिया में जहाँ पुरानी व्यवस्था ढह रही है और नई अभी आकार ले रही है—भारत के निर्णय केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण होंगे।
Watch Full Episode: https://youtu.be/g97YY975Ypg

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